7000 हिंदुओं का नरसंहार कहां हुआ था, ये है द मरीचझापी फाइल्स

आप सोचिए कि हजारों लोग, जिन्में दुधमुंहे बच्चे थे, भूख से तड़प कर मर गए. इतनी लाशें कि सुंदरबन के बाघों तक को इंसानी गोश्त की लत लग गई थी.

7000 हिंदुओं का नरसंहार कहां हुआ था, ये है द मरीचझापी फाइल्स
मरीचझापी के नामशूद्र शरणार्थी. फाइल फोटो

हिंदू अपने ही देश में प्रताड़ित है. आज आप कश्मीर घाटी में हिंदुओं के जिहादी कत्ले-आम, अत्याचार को देखते हैं, तो सिहर उठते हैं. द कश्मीर फाइल्स इस समय देश में सबसे चर्चित टॉपिक है. साथ ही 31 साल बाद हिंदुओं पर हुआ ये जुल्म सबकी जुबान पर है. लेकिन ये तो हिंदुओं के साथ मोपला से लेकर मुरादाबाद तक होता रहा है. आजाद भारत में हिंदुओं का बड़ा नरसंहार आप शायद जानते तक नहीं होंगे. पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने सात हजार से ज्यादा दलित हिंदुओं का कत्ले-आम कराया था. यह जगह थी पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में बसा एक द्वीप मरीचझापी. आजाद भारत के इस सबसे भीषण नरसंहार में मरने वाले बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी थे. आप सोचिए कि हजारों लोग, जिन्में दुधमुंहे बच्चे थे, भूख से तड़प कर मर गए. इतनी लाशें कि सुंदरबन के बाघों तक को इंसानी गोश्त की लत लग गई थी.

पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार

हिंदुओं की हत्या खबर नहीं होती. इस पर धरने नहीं होते. आंदोलन नहीं होते. इन्क्वायरी कमीशन नहीं बैठते. इनकी याद में हर साल जलसे नहीं होते. कोई काला दिवस नहीं मनाता. बदले की कसम नहीं खाई जाती. सरकारें नहीं बदलती. ये हत्याएं दिन की रोशनी में होती हैं और खामोशी से फाइलों में दफन हो जाती हैं. इन्हें दर्ज करना तक जरूरी नहीं समझा जाता. जैसे घाटी में जिहादियों के नरसंहार में मारे गए हिंदुओं का सही आंकड़ा बस अनुमानों पर आधारित है. वैसे मरीचझापी में पुलिस की फायरिंग में मारे गए दलित हिंदुओं की सरकारी संख्या महज दस है. लेकिन वास्तविक संख्या सात हजार से अधिक है. और कुछ अनुमानों के मुताबिक तो ये दस हजार तक है. आपने द कश्मीर फाइल्स की प्रोफेसर मेनन तो देखी ही है. एक वामपंथी जहर से सनी औरत. जिसके लिए हिंदुओं का कत्ल वाजिब है. जिहादी जिसके लिए बेचारे हैं. वामपंथी सोच हर हिंदू के कत्ल को जायज मानती है. इसी सोच की सरकार पश्चिम बंगाल में थी. बात 31 जनवरी 1979 की है. सुंदरबन में बसे इस द्वीप में हिंदू शरणार्थियों पर पुलिस ने फायरिंग की. यहां मारे जाने वाले अधिकतर दलित (नामशूद्र) थे. इस नरसंहार पर कांग्रेस की वैसी ही मौन सहमति थी, जैसी घाटी में कश्मीरी पंडितों पर.

दंडकारण्य से मरीचझापी द्वीप जाते नामशूद्र शरणार्थी.

द्वीप की घेराबंदी में भूख से मर गए लोग

यह कत्ले-आम इतना सिस्टेमेटिक था कि अखबारों में इक्का-दुक्का समाचारों के अलावा दस्तावेजी सुबूत नाम की चीज नहीं है. हिंदुओं को ऋणी होना चाहिए दीप हलदार का. जिन्होंने इसका रोंगटे खड़े कर देने वाला ब्योरा अपना किताब ब्लड आइलैंड (Blood Island: An Oral History of the Marichjhapi Massacre) में दर्ज कर दिया. उन्होंने इस नरंसहार में बचे लोगों की आंखो-देखी और आप-बीती के जरिये पूरा विवरण दिया है. बंटवारे के बाद बांग्लादेश से आए दलित हिंदुओं को वामपंथियों ने ही यहां बसने के लिए प्रेरित किया. उस समय वामपंथी विपक्ष में थे. उन्हें अपनी छवि दलित हितों के चैंपियन वाली पेश करनी थी. राम चटर्जी जैसे नेताओं ने नामशूद्र शरणार्थियों को मरीचझापी द्वीप में बसाया. बंगाल की खाड़ी के इस निर्जन द्वीप को इन हिंदुओं ने अपनी मेहनत से रहने के काबिल बनाया. वामपंथी सत्ता में आए, तो उन्हें ये हिंदू शरणार्थी बोझ लगने लगे. वैसे एक पहलू ये भी माना जाता है कि वे वामपंथियों के संरक्षण से चलने वाले गिरोह के स्मलिंग रूट के आड़े आ रहे थे. बहरहाल इन्हें खदेड़ने की तैयारी शुरू हुई. जिन्हें खुद लाकर इस द्वीप पर बसाया गया था, उन्हें ही अवैध रूप से वन भूमि पर कब्जा करने वाला घोषित कर दिया गया. 26 जनवरी 1979 को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, कम्युनिस्टों की सरकार ने 100 मोटरबोट के जरिये इस द्वीप को घेर लिया. हर सामान की आपूर्ति रोक दी गई. पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया. 31 जनवरी 1979 को यहां पुलिस ने फायरिंग की. नहीं देखा कि कौन बच्चा, बूढ़ा या औरत है. चश्मदीद बताते हैं कि आठ सौ से ज्यादा लोग यहां मारे गए थे.

वामपंथी कैडर के साथ मिलकर पुलिस ने ढहाया कहर

15 दिन बाद हाईकोर्ट ने दखल दिया. एक टीम यहां राशन लेकर पहुंची. उसमें कवि ज्योतिर्मय दत्त भी थे. उनके मुताबिक उन्होंने 17 लाशें देखीं. ये सभी भूख से मर गए थे. लेकिन इन दलितों पर जुल्म का सिलसिला तो अभी शुरू हुआ था. 35 हजार से ज्यादा शरणार्थी द्वीप पर थे. फिर 14 मई आई. पुलिस के साथ इस बार वामपंथी कैडर भी था. 16 मई तक यहां बलात्कार और हत्याओं का दौर चला. मकान-दुकान सब जला दिए गए. लाशें बंगाल की खाड़ी में तैर रही थीं. जो लोग इस जुल्म में जिंदा बचे उन्हें जानवरों की तरह गाड़ियों में भरकर दुधकुंडी कैंप भेज दिया गया. पूरे नरसंहार को कांग्रेस खामोशी से देखती रही. दरअसल मरीचझापी के दलित वामपंथियों के वोटर थे. हलदार ने जो इस नरसंहार का ब्योरा दिया है, वह रोंगटे खड़े कर देता है. किताब में दावा किया गया है कि सात हजार से ज्यादा लोग यहां मारे गए. हिंदुओं के इस नरसंहार से आज भी अधिकतर भारत अंजान है. वैसे ही जैसे कश्मीर घाटी में हुए कत्ले-आम से था. वही वामपंथी इको-सिस्टम इस नरसंहार को करके हजम कर गया. बंगाल में फिर इतिहास अपने-आप को दोहरा रहा है. फिर यहां हिंदुओं का पलायन हो रहा है. इस बाबत देश को जगाने के लिए एक और फिल्म की जरूरत है. द मरीचझापी फाइल्स.