बिहारः नीतीश फार्मूले से ही भाजपा ने किया वीआईपी सुप्रीमो सहनी को फेल

अब वीआईपी नेता मुकेश सहनी को लेकर नरमी दिखा रही जदयू के हाथ अपने नेता के बनाए इस फार्मूले से ही बंध गए हैं। कीमत खुद को सन ऑफ मल्लाह कहने वाले सहनी को चुकानी पड़ रही है।

बिहारः नीतीश फार्मूले से ही भाजपा ने किया वीआईपी सुप्रीमो सहनी को फेल

-गंगेश मिश्र-

पटना। किसी भी संबंध की सफलता में लचीलापन का होना अनिवार्य होता है। इसके बिना गठबंधन की राजनीति भी असंभव है। बिहार में इसी असंभव को जबरिया संभव बनाने की कोशिश में फंस कर एनडीए से बाहर हो चुके हैं वीआईपी के मंत्री मुकेश सहनी। यह जानकारी मंगलवार को सोशल मीडिया पर लाइव आकर उन्होंने खुद दी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू से मदद की जो उम्मीद थी, वह पूर्व में बने चिराग पासवान वाले फार्मूले के कारण पूरी नहीं हो सकी। इसलिए भी कि वह फार्मूला खुद नीतीश कुमार ने बनाया था। यानी मित्र दल का विरोधी पूरे गठबंधन का शत्रु माना जाएगा। इस फार्मूले के कारण ही नीतीश कुमार की पार्टी को तीसरे नंबर पर धकेलने का मुख्य कारण बने चिराग पासवान दिवंगत पिता रामविलास पासवान की जगह न तो केंद्र में मंत्री बन पाए, न एनडीए में रह पाए। अब वीआईपी नेता मुकेश सहनी को लेकर नरमी दिखा रही जदयू के हाथ अपने नेता के बनाए इस फार्मूले से ही बंध गए हैं। कीमत खुद को सन ऑफ मल्लाह कहने वाले सहनी को चुकानी पड़ रही है।

मुकेश सहनी विकासशील इंसान पार्टी यानी वीआईपी के सुप्रीमो हैं। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में वह खुद हार गए, लेकिन उनकी पार्टी के टिकट से चार विधायक बन गए। चार ही विधायक हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानी हम से भी बने। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 का है। अभी सदन में एनडीए के 127, तो विपक्ष के 115 विधायक हैं। ऐसे में हम और वीआईपी के 4-4 विधायक बेहद कीमती हैं। इसी के मद्देनजर मुकेश सहनी राज्य में सत्ताधारी गठबंधन में बड़े भाई भाजपा को आंखें दिखाते रहते हैं। इसमें भितरखाने छोटे भाई जदयू के नेता भी लगे रहते हैं। इसीलिए सहनी उम्मीद लगाए बैठे थे कि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भाजपा के खिलाफ उनके साथ खड़ी होगी। लेकिन बोचहां विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव ने सबके मुखौटे उतार दिए।

सहनी के लिए कुछ भी सही नहीं

दरअसल गत विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर की बोचहां सीट से वीआईपी के मुसाफिर पासवान विजयी रहे थे। वह पहले राजद में थे। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। ऐसे में कायदे से यह सीट फिर से वीआईपी को मिलनी चाहिए थी। पर ऐसा हुआ नहीं। वजह बने खुद मुकेश सहनी। भाजपा पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश में बगैर किसी आधार के कई सीटों पर भाजपा के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतार दिए थे। ऐसा करते हुए उन्होंने भाजपा से संबंध तोड़ लेने की घोषणा कर दी थी। लिहाजा बोचहां में भाजपा ने बेबी कुमारी को अपना प्रत्याशी बना दिया है। वैसे वीआइपी सुप्रीमो मुकेश सहनी ने भी यहां से पूर्व राजद नेता रमई राम की पुत्री गीता देवी को अपना प्रत्‍याशी बना दिया है। पहले उन्होंने दिवंगत विधायक मुसाफिर पासवान के पुत्र अमर पासवान को मैदान में उतारने की घोषणा की थी। लेकिन राजद नेता तेजस्वी ने उनके प्रत्याशी को मैदान में उतरने से पहले ही उड़ा लिया। अमर पासवान अब लालटेन लेकर चल रहे हैं। बदले में सहनी ने राजद के सीनियर नेता रमई राम की पुत्री को उतारकर मुकाबले को तिकोना बना दिया है।

बचे तीन विधायक भी अपने नहीं

मुसाफिर पासवान के निधन के बाद बचे तीनों विधायक वीआईपी के अपने कार्यकर्ता नहीं हैं। दरअसल पिछले साल चुनावी तालमेल में भाजपा ने अपने कोटे से बीआईपी को 11 सीटें दी थीं। सीटों के साथ-साथ प्रत्याशी बनाने के लिए अपने कुछ नेता भी दिए थे। वीआईपी के इस समय बचे तीनों विधायक भाजपा के वे ही नेता हैं। गौड़ाबौराम की विधायक स्वर्णा सिंह से लेकर अलीनगर के विधायक मिश्री लाल यादव और साहेबगंज के राजू कुमार सिंह पहले भाजपाई ही थे।

पूरा होने वाला है एमएलसी का कार्यकाल

दरअसल गत विधानसभा चुनाव में आखिरी समय में मोल-तोल कर एनडीए में आए वीआईपी सुप्रीमो की फितरत को भाजपा पहले ही पहचान गई थी। फिर चुनाव परिणामों के तत्काल बाद विपक्षी महागठबंधन के साथ डिप्टी सीएम बनाने की शर्त पर जब वह भितरखाने गोटी बैठाने लगे, तो रही सही कसर भी पूरी हो गई। इसका खामियाजा उन्हें विधान परिषद के लिए हुए उपचुनाव में तत्काल भुगतना पड़ गया। दो सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने अपने नेता शाहनवाज हुसैन को चार साल के कार्यकाल वाली सीट दिलाई, जबकि मुकेश सहनी को सिर्फ डेढ़ साल ही एमएलसी बने रहने का मौका दिया। ऐसे में अब उन्हें इसी साल फिर से एमएलसी बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोड़ लगाना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)