जिसने ताजमहल, लालकिला और संसद भवन तक बेच डाला

वह शख्स जिसने संसद भवन, लालकिला और ताजमहल तक बेच दिया. जिसने राजीव गांधी, एनडी तिवारी, वी.पी. सिंह तक के नाम को ठगी के लिए इस्तेमाल किया. वह इंसान जिसने आठ बार जेल ब्रेक किया. जब आखिरी बार फरार हुआ तो व्हील चेयर पर था... और उसके बाद से उसे किसी ने नहीं देखा

जिसने ताजमहल, लालकिला और संसद भवन तक बेच डाला
Natvarlal- File Photo

उसने 3 बार ताजमहल, दो बार लाल किला, एक बार राष्ट्रपति भवन और एक बार संसद भवन तक को बेच दिया था. राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के फर्जी साइन करके नटवर लाल ने संसद भवन को बेच दिया था. जिस समय संसद को बेचा था, उस समय सत्र चल रहा था, तमाम सांसद संसद भवन में मौजूद थे.

 राजीव गांधी के नाम पर ठगी

बात 80 के दशक की है. दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित एक घड़ी की दुकान में सफेद कमीज और पैंट पहने एक बूढ़ा आदमी प्रवेश करता है और खुद का परिचय वित्तमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पर्सनल स्टाफ डी.एन. तिवारी रूप में देकर दुकानदार से कहता है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पार्टी के सभी वरिष्ठ लोगों को समर्थन के लिए दिल्ली बुलाया है. इस बैठक में शामिल होने वाले सभी लोगों को वो एक-एक घड़ी भेंट करना चाहते हैं. तो मुझे आपकी दुकान से 93 घड़ी चाहिए. दुकानदार भी एक साथ इतनी घड़ियों को बेचने के लालच से खुद को रोक नहीं पाया.अगले दिन वो बूढ़ा आदमी घड़ी लेने दुकान पहुंचा. दुकानदार को घड़ी पैक करने की बात कह एक स्टाफ को  अपने साथ लेकर वहां पहुंचा जहां प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-बड़े अफसरों का ऑफिस होते हैं. वहां उसने स्टाफ को भुगतान के तौर पर 32,829 रुपए का बैंक ड्राफ्ट दे दिया. दो दिन बाद जब दुाकनदार ने ड्राफ्ट जमा किया तो बैंक वालों ने बताया कि वो ड्राफ्ट फर्जी है. दुकानदार असल में भारत के इतिहास के सबसे बड़े ठग नटवरलाल का शिकार बन चुका था.

जेल ब्रेक का उस्ताद

नटवरलाल, जो जीते जी किवदंती बन गया. कहानी-किस्सों का नायक. एक लीजेंड. किसी जालसाज और ठग को विशेषण के तौर पर उसके नाम से नवाजा जाने लगा. बिहार के सीवान में 1912 में पैदा हुए नटवरलाल की असल जिंदगी पर ही आधारित है, कालिया फिल्म का वो डायलाग. जेलर साहब, मुझे लोहे की जंजीरों से लाद दीजिए. जेल की दीवारे ऊची करा दीजिए. लेकिन कालिया जेल से भाग जाएगा. ऐसा ठग जिसे अपने अपराधो के लिए 113 साल की सजा हुई. लेकिन जेल ब्रेक उसके लिए चुटकी बजाने का खेल था. उसने कुल आठ बार जेल ब्रेक की. आलम ये हुआ कि फरारी के डर से अदालत जेल में लगने लगी. जब वह आखिरी बार फरार हुआ, तो व्हील चेयर पर था. 

असल में कौन था नटवर

नटवर का कहना था, जब तक लालच है नटवरलाल जिंदा है. मैंने किसी से ठगी नहीं की. मैंने किसी से जबरदस्ती पैसे नहीं लिए. लोग मेरे पास आए. कहा, पैसे ले लीजे. मैंने पैसे ले लिए. इसमें मेरा क्या गुनाह है. ठगी अपराध है, लेकिन एक कला है. इसमें न तो गोली होती है न तमंचा न चाकू. बस एक बातों का जाल बुना जाता है. और इस में लालच में डूबा इंसान फंसा चला जाता है. ठगी में कोई जोर-जबरदस्ती नहीं होती. नटवर इसी गेम का मास्टरमाइंड था. वह अपनी बातों से दिल में जो भाव पैदा करता था, उसे लालच कहते हैं. लोग जानते हैं कि लालच में इंसान अंधा हो जाता है. लेकिन फिर भी खुद को अंधा होने से रोक नहीं पाते. नटवरलाल का असल नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था. वकालत की पढ़ाई की थी. नटवर का शिकार बन चुके लोग, उससे दो चार होने वाले पुलिस अधिकारी और कर्मचारी एक और दावा करते हैं.. नटवर ये सारी जालसाजी सिर्फ पैसे के लिए नहीं करता था. वह बड़े शिकार में रोमांच महसूस करता था. उस रोमांच को जीता था.

बिहार के सीवान जिले के बंगरा गांव में 1912 में उसका जन्म हुआ. परिवार ने बड़े अरमानों से उसे मिथिलेश नाम दिया. जिंदगी के सफर की शुरुआत भले ही उसने मिथिलेश नाम से की, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में उसके कुल अलग-अलग 52 नाम दर्ज हुए. उसे नटवरलाल नाम बहुत पसंद था. अपना परिचय वो इसी नाम से देता था. नटवर के जीवन में पहला शिकार उसका पड़ोसी ही था. परिवार उसके लिए बड़े सपने देख रहा था. सामान्य कायस्थ परिवारों की तरह उसके मां-बाप भी यही चाहते थे कि नटवर लिख-पढ़कर नाम रोशन करे. उसी दौरान एक घटना घटी. पड़ोसी ने अपना एक ड्राफ्ट जमा कराने के लिए नटवर को बैंक भेजा. नटवर ने ड्राफ्ट से पड़ोसी के साइन नकली साइन बनाए. ये साइन कुछ इस कदर हूबहू थे कि उसने पड़ोसी के एकाउंट को खाली कर दिया. जब तक पड़ोसी को पता चला, नटवर उसके एकाउंट से एक हजार रुपये (आजादी से पहले के उस दौर में ये बहुत बड़ी रकम थी) साफ कर चुका था. पड़ोसी को इस ठगी की खबर लगी, तो उसने नटवर के परिवार से शिकायत की. एक सामान्य कायस्थ परिवार के लिए ये बहुत बड़ा झटका था. नटवर के पिता ने उसकी जमकर खबर ली. नाराज नटवर ने घर छोड़ा और कोलकाता भाग गया.

कोलकाता से शुरू हुई ठग यात्रा

कोलकाता में उसका नया शिकार इंतजार कर रहा था. इस शख्स का नाम था सेठ केशवराम. यह नटवर कामर्स से ग्रेजुएशन कर रहा था. सेठ ने उसे अपने बेटे को ट्यूशन पढ़ाने के लिए मिथिलेश को रख लिया. उसे ग्रेजुएशन का फाइनल एग्जाम देने के लिए पैसे की जरूरत पड़ी. उसने सेठ से पैसे उधार मांगे, लेकिन सेठ ने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया. मिथिलेश के अंदर का नटवर फिर जाग गया. खार खाए नटवरलाल ने रूई की गांठ का सौदा करने के नाम पर सेठ को साढ़े चार लाख का चूना लगा दिया.

राजीव गांधी सरकार के समय में नटवर ने दिल्ली में कई बड़ी ठगी अंजाम दीं. इसमें से एक ठगी दिल्ली के मशहूर राजा ज्वैलर्स के साथ थी. उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह केंद्रीय मंत्री थे. नटवर ने तमाम ठगी वी.पी. सिंह और एनडी तिवारी का नाम लेकर की. राजा ज्वैलर्स को निशाना बनाने के लिए उसने वी.पी. सिंह के बेटे की शादी का नाटक किया. वह जौहरी के पास पहुंचा और बताया कि वी.पी. सिंह अपने बेटे की शादी के लिए कुछ ज्वैलरी खरीदना चाहते हैं. इसकी जिम्मेदारी मुझे दी गई है. उसने वी.पी. सिंह के निजी सचिव यानी पीए के तौर पर आराम से बैठकर तमाम ज्वैलरी देखीं. फिर इसमें से कुछ बहुत महंगी ज्वैलरी पसंद की. पूरे अधिकार भाव के साथ उसने हिदायत दी की, इस ज्वैलरी को पैक कर दिया जाए. जौहरी से नटवर ने कहा कि इसका पेमेंट मंत्री जी के बंगले पर होगा. इसके लिए वह अपने दो कर्मचारी उसके साथ भेज दें. नटवर ज्वैलरी और उन दो कर्मचारियों के साथ वी.पी. सिंह के सरकारी निवास पर पहुंचा. ज्वैलरी की कीमत 82000 (1986 में यह बड़ी रकम थी) थी. नटवर वी.पी. सिंह के बंगले के अंदर गया. फिर थोड़ी देर में बाहर लौटा तो उसके पास 82 हजार रुपये का ड्राफ्ट था. उसने राजा ज्वैलर्स के दोनों कर्मचारियों को वो ड्राफ्ट बतौर भुगतान थमा दिया. जो शख्स देश के मंत्री के बंगले से ड्राफ्ट लेकर आया हो, उस पर भला इन कर्मचारियों को कैसे शक होता. वे ड्राफ्ट लेकर दुकान पर लौटे और उधर ज्वैलरी लेकर नटवर फुर्र हो चुका था. हमेशा की तरह ये ड्राफ्ट फर्जी निकले. लेकिन हौंसला देखिए. ठगी के लिए देश के केंद्रीय मंत्री के नाम का ही नहीं, बंगले का भी इस्तेमाल किया गया.

कोई कैसे बेच सकता है ताजमहल, लालकिला

अब आपके दिल में सवाल आ रहा होगा कि नटवर कैसे ताजमहल और लाल किला तक बेच लेता था. इसके लिए वह अपने शिकार के तौर पर किसी रईस विदेशी को चुनता था. अपने शिकार का चुनाव करने के लिए वह या तो आगरा व दिल्ली के पांच सितारा होटलों में रेकी करता था या फिर इन पर्यटन स्थलों पर. एक बार जब वह अपना शिकार चुन लेता था, तो खुद को केंद्र सरकार के एक बड़े अधिकारी के तौर पर उसके सामने पेश करता था. वह बताता था कि भारत सरकार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है. विदेशी कर्ज चुकाने के लिए सरकार को पैसों की जरूरत है. इसलिए सरकार विदेशी नागरिकों को ताजमहल और लालकिला बेच रही है. अपने शिकार को मुतमईन करने के लिए नटवर ताजमहल या लाल किले के नकली कागज दिखाता था. इन कागजों में रजिस्ट्री, पुराने नजर आने वाले फर्जी सरकारी दस्तावेज तो होते ही थे, साथ ही इन स्थानों की पूरी ड्राइंग होती थी. इनमें ओपन एरिया, बिल्डिंग एरिया, गार्डन, बेसमेंट का सब ब्योरा होता था. इन कागजात पर सरकारी अधिकारियों के साइन होते थे, जो जाहिर है नटवरलाल ही बनाता था. कागजों का ढेर सरकारी फाइलों में इस तरह पेश करता था कि कोई भी यकीन कर ले. संसद भवन को बेचने के लिए तो उसने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को नकली साइन तक बनाए थे. नटवर एक बार राजेंद्र प्रसाद से मिला भी था. राजेंद्र प्रसाद अपने बिहार स्थित पैतृक गांव गए थे. वहां उसने राष्ट्रपति को उनके ही नकली साइन बनाकर दिखाए. साथ ही राष्ट्रपति के सामने दावा किया था कि अगर उसे मौका दिया जाए, तो वह भारत सरकार का सारा विदेशी कर्ज चुकता कर सकता है. हालांकि डा. प्रसाद ने उसे कहा कि तुम्हारे अंदर प्रतिभा है, इसका सही कार्यों के लिए इस्तेमाल करो और देश की सेवा करो.

खुद को समझता था रॉबिनहुड

लेकिन नटवर रोमांच के लिए जीता था. उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में उसने एक के बाद एक ठगी की वारदातें अंजाम दी. वह जब अखबारों की सुर्खियों में अपना नाम देखता, तो बहुत खुश होता. वह खुद को हीरो जैसा फील करता. वह अपनी रॉबिनहुड जैसी छवि बनाना चाहता था. कानपुर में एक ज्वैलर के यहां ठगी को अंजाम देते हुए वह गिरफ्तार हुआ. उसने एक पुलिस अधिकारी से कहा था कि मैं क्या गलत कर रहा हूं. अमीरों के पैसे लेकर मैं गरीबों में बांट देता हूं. मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल पर सौ से ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए. उसने देश के बड़े उद्योगपतियों तक को शिकार बनाया. रिलायंस समूह के धीरूभाई अंबानी, टाटा समूह के रतन टाटा जैसे सुलझे हुए उद्योगपति उसका शिकार बने. उद्योगपतियों को निशाना बनाने के लिए वह समाजसेवक का रूप धर लेता. फिर किसी फर्जी संस्था के कागजात दिखाता. कभी विकलांगों की सेवा की कहानी सुनाता, तो कभी बीमारों के ईलाज के बड़े-बड़े किस्से पेश करता. उसके नकली कागजात, सेवा कार्यों की फर्जी फोटो अलबम और कुल मिलाकर उसका व्यक्तित्व इन उद्योगपतियों को उस पर यकीन करने के लिए मजबूर कर देता. उसने सेवा कार्यों के नाम पर उद्योगपतियों से चंदा उगाहने के नाम पर भी मोटी ठगी की.

150 से ज्यादा मुकदमे

150 से अधिक मुकदमे उस पर दर्ज हुए. कुल नौ बार नटवरलाल गिरफ्तार हुआ. इसमें एक बार उसे जमानत मिली. आठ बार वह फरार हुआ. नटवरलाल जेलब्रेक में इतना माहिर था कि बाकायदा ऐलान करके फरार होता था. उसकी फरारी के डर से उसे कोर्ट की तारीख पर ले जाना बंद कर दिया गया. उसके लिए अदालत जेल में लगने लगी. आशंका ये थी कि जेल ले जाने के दौरान वह फरार हो सकता था. लेकिन वह हर बार जेल से फरार हुआ. आखिरी बार वह 1996 में जेल से फरार हुआ. उस समय वह 84 साल का था. नटवर जेल में गंभीर रूप से बीमार हो गया. वह चलने-फिरने से भी मोहताज हो गया. उसे यूपी पुलिस के तीन सिपाही इलाज के लिए दिल्ली लेकर पहुंचे. दिल्ली रेलवे स्टेशन पर वह व्हील चेयर पर लाया गया. महीनों से वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हुआ था. दो सिपाही किसी काम से गए और एक सिपाही नटवरलाल के पास रह गया. नटवर ने चाय पीने की इच्छा जाहिर की. सिपाही ने सोचा कि व्हील चेयर पर बैठा ये अपाहिज कहां जाने वाला है. वह चाय लेकर लौटा, तो देखा कि नटवर गायब है. उसके बाद नटवर दोबारा कानून की गिरफ्त में नहीं आया. एक बार वह दरभंगा स्टेशन पर देखा गया, लेकिन जब तक पुलिस पहुंची, मालगाड़ी में उसके कपड़े लावारिस पड़े थे और गार्ड के कपड़े गायब थे. कोर्ट में उसके परिवार की ओर से अर्जी दी गई कि नटवर की मौत हो चुकी है. उसका अंतिम संस्कार रांची में किया जा चुका है. लेकिन कोर्ट तक इस पर एतबार न ला सकी. यही नटवर की आखिरी चर्चा थी.